#गुरु स्तवन आह्वान स्तोत्र ।। Guru praise invocation hymn
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इस स्तवन के पाठ अथवा श्रवण मात्र से गुरुदेव सूक्ष्म रुप में उपस्थित होते ही हैं, यह एक अनुभव जन्य प्रमाण है।मात्र स्तोत्र पाठ से ही जीवन मे कई प्रकार की अनुकूलताएं प्रप्त हो जाती है ।
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स्तोत्र स्वयं मे मंत्र स्वरुप होते है। किंतु मंत्रो की अपेक्षा एक अन्य विशिष्टता होती है किसी भी स्तोत्र में जहां मंत्र वर्णो का विशिष्ट संयोजन होता है वहीं किसी भी स्तोत्र में लयबद्वता भी होती है तथा इसी लयबद्वता के कारण यह सहज स्वाभाविक हो जाता है कि साधक के हृदय के भाव पूर्णता से प्रस्फुटित हो सकें ।
प्रयोग विधि:-जब कभी भी इस स्तवन का पाठ करने का भाव मन में उमडे़ तब शुद्व वस्त्र धारण कर उत्तरमुख होकर आसन पर बैठे, वातावरण को धूप अगरबत्ती के द्वारा सुगंधमय कर ले तथा अपने समक्ष किसी बाजोट पर बस्त्र बिछाकर पुष्प की पंखुडियों को गुरुदेव हेतु आसन के रुप में स्थापित करें ।
सामूहिक अथवा व्यक्तिगत गुरुपुजन , गुरु साधना के अवसर पर इस स्तोत्र का पाठ गुरुदेव का यथोचित्त विधि से पूजन करने के उपरान्त करें, मध्य में अथवा प्रारम्भ में नहीं- ऐसा सिद्वाश्रम गुरु – पूजन क्रम में उल्लिखित है।
मात्र परीक्षण के रुप में, किसी कौतूहल या किसी भी प्रकार से अगरिमा मय रुप में इस स्तवन का पाठ करना सर्वथा वर्जित है ।
‘ स्तोत्रम!!’
पूर्णं सतान्यै परिपूर्ण रुपं
गुरुर्वै सतान्यं दीर्घो वदान्यम् ।
आविर्वतां पूर्णं मदेव पुण्यं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥1
त्वमेव माता च…….
न जानामि योगं न जानामि ध्यानं
न मंत्रं न तंत्रं योगं क्रियान्वै ।
न जानामि पूर्ण न देहं न पूर्वं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥2
त्वमेव माता च…………….
अनाथो दरिद्रो जरा रोग युक्तो
महाक्षीण दीनं: सदा जाडय वक्त्र: ।
विपत्ति प्रविष्ट: सदाऽहं भजामि
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥3
त्वमेव माता च…………..
त्वं मातृ रुपं पितृ स्वरुपं
आत्म स्वरुपं प्राण स्वरुपं ।
चैतन्य रुपं देवं दिवन्त्रं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥4
त्वमेव माता च…………….
त्वं नाथ पूर्णं त्वं देव पूर्णं
आत्म च पूर्णं ज्ञानं च पूर्णम् ।
अहं त्वां प्रपद्ये सदाऽहं भजामि
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥5
त्वमेव माता च……………….
मम अश्रु अर्घ्यं पुष्पं प्रसूनं
देहं च पुष्पं शरण्यं त्वमेवम् ।
जीवोऽवदां पूर्ण मदैव रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥6
त्वमेव माता च……………….
आवाहयामि आवाहयामि
शरण्यं शरण्यं सदाहं शरण्यं ।
त्वं नाथ मेवं प्रपद्ये प्रसन्नं
गुरुर्वै शरणयं गुरुर्वै शरण्यम॥7
त्वमेव माता च…………….
न तातो न माता न वन्धुर्न भ्राता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न वित्तं न वृत्तिर्ममेवं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥8
त्वमेव माता च ………..
आबद्ध रुपं अश्रु प्रवाहं
धियां प्रपद्ये हृदयं वदान्ये ।
देहं त्वमेवं शरण्यं त्वमेवं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥9
त्वमेव माता च…………….
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं
गरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्।
एको हि नाथं एको ही शब्दं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥10
त्वमेव माता च………………
कान्तां न पूर्व वदान्यै वदान्यं
कोऽहं सदान्यै सदाहं वदामि ।
न पूर्व पतिर्वै पतिर्वै सदाऽहं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥11
त्वमेव माता च …………….
न प्राणो वदार्वै न देहं नवाऽहं
न नेत्रं न पूर्व सदाऽहं वदान्यै ।
तुच्छं वदां पूर्व मदैव तुल्यं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥12
त्वमेव माता च …………….
पूर्वो न पूर्वं न ज्ञानं न तुल्यं
न नारि नरं वै पतिर्वै न पत्न्यम् ।
को कत् कदा कुत्र कदैव तुल्यं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥13
त्वमेव माता च……………….
गुरुर्वै गतान्यं गुरुर्वै शतान्यं
गुरुर्वै वदान्यं गुरुर्वै कथान्यम् ।
गुरुमेव रुपं सदाऽहं भजामि
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥14
त्वमेव माता च………………
आत्रं वतां अश्रु वदैव रुपं
ज्ञानं वदान्यै परिपूर्ण नित्यम्
गुरुर्वै व्रजाहं गुरुर्वै भजाहं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥15
त्वमेव माता च……………..
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव वंधुश्च सखा त्वमेव् ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्व मम् देव देव॥16
त्वमेव माता च…………….
